Tuesday, 7 August 2012

vचल तू राही


चल तू राही 

चलने से क्यूँ घबराता है ,
इन राहों का तू है राही l
पास बहुत है मंजिल तेरी,
 अविचल हो कर चल तू राही ll

बिखरें हों गर पथ में कांटे ,
शूल चुभन से रुक मत पाथी l
फूल खिलें हों गर राहों में ,
हँसते हँसते चल तू राही  ll
पास बहुत है ...............

लहरों के तांडव नर्तन में ,
धीरज धर बन्जा तू मांझी l
धारा गर अनुकूल रहे तो ,
मौज उड़ाता चल तू राही ll
पास बहुत है ..............

घनघोर घटाएँ  तूफां आएं ,
लड़खड़ा पर चल तू राही l
शीतल मंद पवन झोंके हों,
 गुनगुनाता चल तू राही  ll
पास बहुत है ...............
प्रमिला आर्य 




सम्बल तुम हो ......


 सम्बल  तुम हो 
सबलों के संबल बहुतेरे पर निर्बल के संबल तुम हो l
शीश हाथ धर संकट हरते मनवा धीर बंधाते हो ll

आँधी तूफां की झंझा ने जब जब भी झकझोरा हो l
विपदाओं के भाँवर में जब कश्ती डगमग डोली हो l
बन  खेवैया स्वामी  तुम ही  नैया पार लगाते  हो   ll 
शीश हाथ धर ........................................

कोई  जावे वृंदावन औ कोई  काशी मथुरा जावे   l
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम चार धाम कोई करआवे l  
कर्तव्यों के पालन में मुझे तीर्थ धाम करवाते हो ll
शीश हाथ धर ............................................

त्रय -ताप-तप्त आकुल व्याकुल  जन ने टेर लगाई हो  l
दुःख की दावानल ने स्वामी जब भी अगन लगाई हो l
शीतल  बौछारों  से प्रभु  जी शीतलता   पहुंचाते  हो  ll
शीश हाथ धर ..............................................

मोह माया  जंजालों में जब  मनवा  जग में भटका  हो  l
राह नहीं मिलती  जब  कोई  तुम ही  राह दिखाते हो  l
करुणा कर करूणानिधि तुम ही क्लेश कलुष मिटाते हो ll
शीश हाथ धर ....................................................
प्रमिला आर्य 



पणिहारियाँ

यह गीत बचपन की उन स्मृतियों के आधार पर लिखा है 
जब मेरी झालरापाटन नगरी में नल नहीं थे और
 पानी कुवे से भर कर लाना पड़ता था l जब  हमारे घर की  कुई पर
 मोहल्ले की  काकी जी भाभी जी का पानी भरना याद आता है तो
मेरा दिल कुछ  यूँ गुनगुनाता है -


                  पणिहारियाँ              ~~~~~~~~~~~~~
माथे ऊपर मेल बेवड़ा रास मूंज की कांधे डाल्याँ 
पणिहारियाँ ये पाणी चाली  पनघट पे ये पाणी चाली रे

तड़के तड़के उठी गौरडियां 
आंगणियां में बैठी अर वे
लागी चमकावण गागरिया
फाणीड़ो भरबा  ने चाली
पणिहारियाँ ये फाणी चाली
लेर गागरिया फाणी चाली रे

माथे रखडी नाकां नथणि
कानां झुमका गले खुगाली
सतरंगी वे औड चुनरिया
फाणीड़ो  बरवा ने चाली
पणिहारियाँ ये फाणी चाली
औड चुनरिया फाणी चाली रे

आँख्यां मां काजल भाल पे टिंकी
मेंदी रचाई मान्ग्याँ भरली
कर सोला सिणगार गौरडियां
फाणी ड़ो भरबा ने   चाली
पणहारियाँ ये फाणी चाली ll
कर सिणगारियां फाणी चाली रे

हाथां मां चुडला खनखन खनके
रुणझुन रुनझुन झांझर झनके
मंदी स़ी मुस्कान बखेरियां
फाणी ड़ो भरबा  ने चाली
पणहारियां ये फाणी चाली
हंसती हंसाती फाणी चाली रे

सीता गीता सुगना रुकमा
आओ री सखियाँ फाणी चाल्याँ
ले ले गागर सगली सहेलियां
फाणी ड़ो भरबा  ने चाली
पणहारियां ये फाणी चाली
हिलमिल सखियाँ फाणी चाली रे

कुवे पाल पे मेल बेवड़ा
बाताँ वे बतियावण लागी
सुख दुःख सगला बाटण लागी
फाणी ड़ो भरबा  ने चाली
पणिहारियां ये फाणी चाली
बाताँ करती फाणी चाली रे

माथे ऊपर मेल बेवड़ा ...............
                           - प्रमिला आर्य 

फूल से.......

फूल से                            
                   की

देख कर ज़िंदादिली
पूछा मनुज ने फूल से 
वन -उपवन क्यूँ महकाते हो 
घिर के  भी तुम शूल से 
मुस्काया,फिर होले से 
फूल बोला यों मनुज से 
काँटों से क्यूँ मैं घबराऊं 
मैं तो मेरा धर्म निभाऊं 
                    - प्रमिला 



फूल फूल से द्वेष है रखता  कलियाँ बागी  हो गई 
रात के अंधियारों से डर के सूनी गलियां सो गईं 
दहशतगर्दों की दहशत से मानवता की जड़ें हिल गई 
प्यार दया करुणा ममता की पन्नों पर बातें रह गई 
प्रमिला आर्य

प्रकृति का तांडव देख ऐसा लगा -

प्रकृति का तांडव देख  ऐसा लगा -

देखा सुन्दर  कुदरत  को  तो हैरां हो गए हम ,
लीलाधर की लीला पर नतमस्तक हो गए हम ,
मंज़र बर्बादी  का देखा हमने जब  इन्सां का ,
कैसा ये इन्साफ है उसका लगे सोचने हम .
प्रमिला आर्य       
ज़िन्दगी की 
टेडी मेढ़ी राहों पर 
चलते चलते .थक कर 
चकनाचूर 
हो गया पथिक 
लगने लगी 
ज़िन्दगी बोझिल 
आंधी आई ऐसी कि
धूल के गुबार में 
दब गई ज़िन्दगी 
दिल के अरमां 
सूखे पत्तों से 
चरमरा गए 
दिल टूटा 
अपनों का साथ छूटा
बदल गई ज़िन्दगी की
परिभाषा 
छा गई उदासी 
मायूसी और हताशा 
संताप तप्त पथिक 
विकल लाचार बेबस 
बैठा कोस रहा था 
ज़िन्दगी को 
तभी ......
हवा के झोंके का 
शीतल सुखद स्पर्श 
ऐसा मिला कि
सोच बदल गई 
राह बदल गई 
हताशा उदासी 
और मायूसी 
काफूर हो गई 
सोचने लगा वह 
बस बहुत हुआ 
अब ना रुकना है 
ना मायूस होना है 
मुझे चलना है
अनवरत चलना है 
अपने लिए जीना है 
वक्त की मार ne
मारा है अब तक 
अब कुछ कर 
दिखाना है वक्त को 
फिर चल पड़ा राही 
उत्साह उमंग 
उल्लास लिए मन में        
ज़िन्दगी सँवारने 
गन्तव्य को  पाने                   
समर्पण --- 
स्नेह प्रपूरित 
दीप का
स्नेह मिला
सम्बल मिला 
आश्रय मिला 
एक लघु स़ी 
कोमल स़ी 
बाती को तो,
 हो समर्पित
ज्योतित हुई      
और
तिमिराच्छादित
लोक को
कर दिया
प्रभा - प्रभासित /
कहने लगे हम
दीप जल गया
आलोक हो गया ,
जला कर
अस्तित्व अपना ....
दिलाई पहचान
दीप को ./,
यों .....
स्नेह सम्बल आश्रय का
प्रतिदान बाती ने दिया
हो समर्पित
बुझ गई फिर
लघु स़ी बाती //
हुई  समर्पित
लघु स़ी बाती
प्रमिला आर्य 
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जन्मदिन की शुभकामनाएं ......

जन्मदिन की शुभकामनाएं 
दिन दूनी निशि चौगुनी ,करें उन्नति आप 
मंगलमय है  कामना ,बढ़ता रहे प्रताप /
शब्द वर्ण विन्यास से ,करते वाणी विलास  
रचनायें रचते रहें ,ऐसी है अभिलास /
सुख समृद्धि सम्पदा , रहे हमेशा साथ 
शीश रहे नित आपके, माँ वागीशा हाथ /
प्रमिला आर्य 


फूलें फलें उन्नति करें खुशहाली हो जीवन में 
जन्मदिन के अवसर पर ये कामना करती हूँ मैं /
फूलों से नित बाग़ सजा हो  खुशबू से महके अंगना 
रबड़ी बनाऊं आज मैं ग़र ले आओ संग में सजना/
प्रमिला आर्य 

साहित्य संगीत और कला का 
माँ शारदे दे वरदान 
सतत साधना आराधन से 
पूरे हों तेरे अरमान  /
स्वस्थ सदा सुखी रहो तुम 
फूल खिले हों गुलशन में 
महिमा की महिमा बढे
नित खुशियाँ हो दामन में 
जन्मदिन के अवसर पर मैं 
कामना करती हूँ ये l
प्रमिला आर्य 

मानस में चिन्तन मनन,और लेखनी हाथ l
रचनाधर्मी  के सदा , मात शारदे  साथ ll

गुलदस्ता है हाथ में , भाभी जी हैं पास
तैलंग जी इक प्रश्न है ,अवसर है क्या ख़ास

स्वप्न------

स्वप्न------
सपनो के महल 
बनाये थे जो कभी 
बिखर गए  
घरौंदों के मानिंद ,
सपने सलोने 
जो देखे थे कभी 
बिखर गए 
टूट कर कांच की तरह ,
स्वप्न बिखरे टूटे ,
ध्वस्त हुवे तो क्या ?
हम ..
फिर से देखेंगे स्वप्न 
फूलों की तरह 
सुकोमल 
सुन्दर और मनोहर 
जो खिलेंगे फूलेंगे 
काँटों में रह कर भी  
महकाएँगे 
हमारी आशाओं के उपवन 
और -अंतत:
दे जायेंगे 
सुनहरे भविष्य के 
ठोस सुदृढ़ उपजाऊ 
नव बीज 
इस युग के 
बीज दे जाएंगे 
नव निर्माण के 
पुनर्निर्माण के 

काले बादल -------------

काले बादल 
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प्यासी  धरती की प्यास बुझाने 
आये काले काले बादल
गरज गरज कर मचलमचल कर   
बरसे काले काले बादल 
शोले बरसाते गर्वित रवि का 
दम्भ  मिटाने आये बादल 
ताप तप्त जगतीतल भर का 
ताप मिटाने आये बादल                
पीताभ हुआ धरा का अँचल
धानी चूनर लाये बादल 
प्रमिला आर्य 
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प्यासी  धरती की प्यास बुझाने 
आये काले काले बादल
गरज गरज कर मचलमचल कर   
बरसे काले काले बादल 
शोले बरसाते गर्वित रवि का 
दम्भ  मिटाने आये बादल 
ताप तप्त जगतीतल भर का 
ताप मिटाने आये बादल                
पीताभ हुआ धरा का अँचल
धानी चूनर लाये बादल 
प्रमिला आर्य