Sunday, 12 August 2012

ज़िन्दगी की 
टेडी मेढ़ी राहों पर 
चलते चलते .थक कर 
चकनाचूर 
हो गया पथिक 
लगने लगी 
ज़िन्दगी बोझिल 
आंधी आई ऐसी कि
धूल के गुबार में 
दब गई ज़िन्दगी 
दिल के अरमां 
सूखे पत्तों से 
चरमरा गए 
दिल टूटा 
अपनों का साथ छूटा
बदल गई ज़िन्दगी की
परिभाषा 
छा गई उदासी 
मायूसी और हताशा 
संताप तप्त पथिक 
विकल लाचार बेबस 
बैठा कोस रहा था 
ज़िन्दगी को 
तभी ......
हवा के झोंके का 
शीतल सुखद स्पर्श 
ऐसा मिला कि
सोच बदल गई 
राह बदल गई 
हताशा उदासी 
और मायूसी 
काफूर हो गई 
सोचने लगा वह 
बस बहुत हुआ 
अब ना रुकना है 
ना मायूस होना है 
मुझे चलना है
अनवरत चलना है  
फिर चल पड़ा राही 
उत्साह उमंग 
उल्लास लिए मन में        
ज़िन्दगी सँवारने 
गन्तव्य को  पाने    

मित्रता--------------

मन माटी में 
बीज मित्रता का
 आरोपित कर
सद्भावों से अभिसिंचित 
होकर
फूटने लगी कोंपल
कोमल कोमल
शनै :शनै:
पल्लवित होता
पुष्पित होता
सुरभित  करता 
घर आँगन और बस्ती को
लहलहाने लगता है 
 घनीभूत हो 
आल्हादित हो 
पा जाता है 
पूर्ण देह 
देता रहता नेह छाँव 
आश्रय की आशाओं को 
एक नन्हा सा बीज
मित्रता का 
यों ही 
मन की 
माटी पर 
प्रमिला आर्य 





Saturday, 11 August 2012

बेगानों से भरा है यह जहाँ 
साथ कब कोई देता है यहाँ 
कहने को तो कह देते सभी 
वक्त पड़े मुंह मोड़ लेते यहाँ l

सच्चा मित्र वो ------------

सच्चा मित्र वो 
सुख दुःख में साथ 
निभाता सदा 

द्वेष ना वैर 
छल ना छद्म कभी   
करता मीत 

स्वार्थ रहित 
होता है सच्चा मीत 
करता हित 

कृष्ण जन्माष्टमी ---------------


युद्ध  ही  धर्म 
त्याग मोह को पार्थ 
कर तू कर्म 

मीरां दीवानी 
सांवरे रंग राची
प्रेम कहानी 

पी गई मीरां 
तेरे ही भरोसे पे 
विष का प्याला  

कदम्ब- डार 
गोविन्द तेरी लीला 
अपरम्पार 



कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनायें 
मित्रता ऐसी 
कृष्ण सुदामा जैसी 
होते हितेषी 


गगरि फोरी
ग्वालन संग करे 
माखन चोरी 
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रास रचैया 
नटखट कन्हैया 
पकड़ी बैंया  
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माखन चोर 
गोपिन सिरमोर 
है चितचोर 
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गोविन्द हरि
दीन दुखी की पीर 
तुमने हरी
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 यशोदा माता 
तेरा ये नंदलाला 
हमें सताता 

देश भक्ति --------------

देश भक्ति ----------------
१.आज़ादी पर्व
 स्वतंत्र हुआ देश 
 हमें है गर्व 
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२. बोस आज़ाद 
   थे तिलक भगत 
   शान -ए- हिंद 
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३.वीर महान
 भारत माँकी शान 
 हुवे  कुर्बान 
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४.नहीं भूलेंगें 
प्राणोत्सर्ग तुम्हारा 
याद रखेंगें 
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५.धन्य वो माँ 
 जन्मा वीर सपूत 
 उसे नमन 
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६.भेजे रण में 
  माँ -पत्नी -बहन 
  धन्य हैं वो 
७. गर्व है मुझे 
   खाई गोली सीने पे 
   नहीं पीठ पे 
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८.तेरा उत्सर्ग 
   याद रहेगा सदा 
   गया तू स्वर्ग 
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९..नत मस्तक 
  अनाम शहीदों को 
  करते हम 
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१०.देश भक्त तू 
  वीर सपूत माँ का 
  शान भी है तू 
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११.स्वतंत्रता की 
    वेदी में दी आहुति 
    निज प्राणों की 
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१२..जा रहा हूँ मैं 
     माँ की शान तुम्हारे 
     सौंप हाथ में 
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१३..नहीं धन की 
    न थी चाह यश की 
   थी आज़ादी की 
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१४.कामना मेरी 
 आँख उठाके कभी 
 देखे न बेरी 
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१५.रोती है आत्मा 
    महान संस्कृति का 
    हो रहा खात्मा
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१६ .भाव उदात्त 
    विश्व बन्धुत्वा भरा 
    हैं गर्वोन्मत्त 
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१७.जन्मभूमि ये 
    स्वर्ग से भी सुन्दर 
   आओ पूजें 
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१८.लगा भाल पे 
   रोली अक्षत टीका 
   भेजे रण में
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Tuesday, 7 August 2012

व्यथा की घनघोर घटाएँ जब मंडराएंगी 
घनीभूत हो मन उद्वेलित  कर जाएँगी
उमड़ घुमड़ कर उमड़ेंगें  जब भाव हृदय में 
कोरे कागज़ पर तब गीत उकर कर आएँगे /
प्रमिला आर्य 

तू ज़रा तो मुस्कुरा ले ................

तू ज़रा तो मुस्कुरा ले ................
ग़र तू पाना चाहे मंजिल आशा के तू दीप जला ले 
छोड़ हताशा दिल से अपने तू ज़रा तो मुस्कुरा ले /

आंधी तूफाँ चाहे आयें 
हो ना विचलित तू ज़रा भी
लक्ष्य  ग़र तूने हो साधा  
चलना सिखलाती है बाधा 
तू लगन की लौ लागले 
तू ज़रा तो ..................

कर्म में विश्वास हो संकल्प 
में दृढ़ता रही तो 
रोक पाएगा ना तूफाँ 
छाये चाहे तिमिर घनेरा 
मुशकिलों को गले लगा ले 
तू ज़रा तो .................

कार्य कितना भी कठिन हो 
मार्ग जितना भी जटिल हो 
धैर्य  अपना खो ना दे ग़र
सफलता पग चूम लेगी 
कर्म की तू अगन जला ले 
तू ज़रा तो ...................

पथ में कांटे य कंकर हो 
पग में चाहे शूल चुभे हों 
पीड़ा का अहसास ना ग़र हो 
मंजिल तेरी दूर नहीं है 
तू ज़रा तो .................

लहरों से टकराना जाने 
धाराएँ जिसे रोक ना पायें 
तूफाँ से जो हार ना मानें 
तरणि तट को पा जाएगी 
हिम्मत की पतवार तू ले ले 
तू ज़रा तो ............

गुरु........

ज्ञान -सुमन सौरभ से गुरुजन 
जग जन को सुरभित करते हैं 
ओजस्वी वाणी प्रेरण से 
मार्ग प्रदर्शित करते हैं 
ज्ञानदीप की जोत जलाकर 
अज्ञान तिमिर को हरते हैं 
ऐसे गुरुजन के चरणों में 
हम नमन करते हैं 
प्रमिला आर्य 
बोली  जाका मुख सुणु, पूछूँ झट से गांव l
पीहरिया रो जाण के, जागे आदर भाव  ll

ओल्यू आवे रात दिन, आंगनियाँ रा खेल l
थां बिन बाबुल छूट ग्या, पिहरिया रा गेल ll

बातां करता बैठ के, आंगनिया मां खाट l
मनसुं बिसरूं ना कदी, मायड़ थारी बाट  ll

मेनत करती रात दन, तनिक नहीं बिसराम l 
तू तो माँ बस जाणती, है आराम हराम ll
                                    -
मात-पिता सम कोउ नहीं, आवत है ये बिचार l
माँ गयी मौसाल गयो, पिता गए परिवार ll 
                                         प्रमिला आर्य