Saturday, 1 September 2012

मित्रता ---------


मित्रता ----------

मन माटी में 
बीज मित्रता का
 आरोपित कर
सद्भावों से अभिसिंचित 
होकर
फूटने लगी कोंपल
कोमल कोमल
शनै :शनै:
पल्लवित होता
पुष्पित होता
सुरभित  करता 
घर आँगन और बस्ती को
लहलहाने लगता है 
 घनीभूत हो 
आल्हादित हो 
पा जाता है 
पूर्ण देह 
देता रहता नेह छाँव 
आश्रय की आशाओं को 
एक नन्हा सा बीज
मित्रता का 
यों ही 
मन की 
माटी पर 
प्रमिला आर्य 











पा कर स्वर का साथ तार वीणा के  बजने लगे 
लय और आलाप के संग गीत सुन्दर सजने लगे 
आरोही अवरोही बन कर राग मधुर बहने लगे  
भाव सरित की लहरों में अवगाहन करने लगे 

भरे उमंग 
हो जब तकरार 
सजन संग 
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तांका  -------
रजनी रानी 
झिलमिल तारों की 
ओढ चूनर 
श्याम सलोनी तुम 
लगती प्यारी प्यारी
===============
चांदनी तुम 
शीतल सुखदाई 
मन को भाती
करती हो धरा को 
आभा से आभासित 
=================
सच्चिदानंद
ज्ञान -बुद्धि -विवेक 
दो मेरे प्रभु 
============
क्षणभंगुर 
है चराचर जीव 
सारा संसार 
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महिना बीता
पाक़ रमजान का 
आज है ईद 
और बनी सिवैंया 
हो मुबारकबाद 

प्रमिला आर्य 

हाइकू -----



हाइकू -----
मानव जन्म 
अनमोल भर लें 
ख़ुशी  के  रंग  
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आओ भर दें 
दीन दुखी के मन 
ख़ुशी के रंग 
========
गरीब के भी 
जीवन में भर दें 
ख़ुशी के रंग 
==========
   जीवन 
धार ले  धर्म 
जीवन है नश्वर 
कर सत्कर्म 
==============
जीवन जीना
आसन ना जग में 
कष्ट अनेक 
==============
फल ना चाहो 
कर्म करो निष्काम 
जीवन जीओ 
============
गम का साया 
खुशियों की बहार
जिन्दगी संग 
=============
जीवन वो ही 
चले अनवरत 
रुके तो मौत 
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आहें ना भर 
दु:ख सुख चलते 
जीवन संग 
=============
प्रमिला आर्य 


हाइकु , तांका ------




हाइकु , तांका ------

खिला काँटों में 
महकाता चमन 
लगता प्यारा 
============
आँख से  आंसू 
गिरने ना दें कभी 
हैं अनमोल
============
आँख से आंसू 
गिर कर कहते 
मन की व्यथा 
===========
बंसी अधर 
चंचल चितवन 
राधा के संग 
रास रचाए कान्हा 
यमुना तट पर 
===========
बंसी अधर 
चंचल चितवन 
राधा के संग 
रास रचाए कान्हा 
यमुना तट पर 
===========
मनमोहना 
चंचल चपल तू 
लगता प्यारा
===========
आँख का  तारा 
लूं मैं तेरी बलैयां
तू मेरा चंदा 
===========
शैतानी तेरी 
लागे मनोहारी 
ख़ुशी तू  मेरी 
============
मनमोहना 
चंचल चपल तू 
लगता प्यारा 
============
ऑ री पवन  
ले जा मेरा संदेस 
जहाँ सजन 
============
दर्द दे दिया 
अपना बना  कर 
जलता जिया 
============
सजन  तुम 
भूल गए जाकर 
व्याकुल हम 
=============
नहीं है चैन 
आ जाओ ना सजन 
हम बेचैन 
=============
रूठे बलम
की प्रतीक्षा कितनी 
आए ना तुम 
==============
-- 
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हाइकू ------



हाइकू ------
आँख का  तारा 
लूं मैं तेरी बलैयां
तू मेरा चंदा 
=============
शैतानी तेरी 
लागे मनोहारी 
ख़ुशी तू मेरी 
==============
मनमोहना 
चंचल चपल तू 
लगता प्यारा 
==============
ऑ री पवन  
ले जा मेरा संदेस 
जहाँ सजन 
=============
दर्द दे दिया 
अपना बना  कर 
जलता जिया 
============
सजन  तुम 
भूल गए जाकर 
व्याकुल हम 
===========
नहीं है चैन 
आ जाओ ना सजन 
हम बेचैन 
============
रूठे बलम
की प्रतीक्षा कितनी 
आए ना तुम 
============
ज़िन्दगी की 
टेडी मेढ़ी राहों पर
चलते चलते .थक कर 
चकनाचूर 
हो गया पथिक 
लगने लगी 
ज़िन्दगी बोझिल 
आंधी आई ऐसी कि
धूल के गुबार में 
दब गई ज़िन्दगी 
दिल के अरमां 
सूखे पत्तों से 
चरमरा गए 
दिल टूटा 
अपनों का साथ छूटा
बदल गई ज़िन्दगी की
परिभाषा 
छा गई उदासी 
मायूसी और हताशा 
संताप तप्त पथिक 
विकल लाचार बेबस 
बैठा कोस रहा था 
ज़िन्दगी को 
तभी ......
हवा के झोंके का 
शीतल सुखद स्पर्श 
ऐसा मिला कि
सोच बदल गई 
राह बदल गई 
हताशा उदासी 
और मायूसी 
काफूर हो गई 
सोचने लगा वह 
बस बहुत हुआ 
अब ना रुकना है 
ना मायूस होना है 
मुझे चलना है
अनवरत चलना है  
फिर चल पड़ा राही 
उत्साह उमंग 
उल्लास लिए मन में        
ज़िन्दगी सँवारने 
गन्तव्य को  पाने                          

Monday, 13 August 2012

मधुर गान ----------
मिल जाता जब 
मन मानस को
सबल सम्बल
या कर जाती पीर
प्रबल प्रहार
निसृत होते तब
हृदयोद्गार
और
रच जाता तभी
एक मनोहर गान /
मन वीणा के तार
सुर ताल लय में
एक साथ जब
होते झंकृत
छिड़ने लगती
तानें और आलाप
बन जातीं हैं
राग मधुर ,और
थिरकने लगता
मन मयूर
यूँ ही बार बार

प्रमिला आर्य


होती हूँ जब तन्हा तन्हा
पग रखती तुम नन्हा नन्हा 
मन मानस के दरवाजे पर 
होले से सांकल खटकाती 
भूली बिसरी ताज़ा करके 
फिर अतीत की सैर कराती
तब होती हूँ मैं न अकेली 
क्या तुम मेरी सखी सहेली 

मन वीणा के तार छेड़ कर 
झंकृत तुम कर देती हो 
अधरों पर मुस्कान कभी बन 
हर्षित मुझको  कर  देती  हो 
कभी कुरेद कर ज़ख्मों को तुम 
व्यथा व्यथित कर देती हो 
संग में  मेरे हर पल खेली 
क्या तुम मेरी सखी सहेली

पूछूं तुमसे कौन सखी तुम 
रिश्ता नाता क्या है तुमसे 
संग सदा तुम मेरे रह कर  
लुका छिपी का खेल खेलती 
अब तो बतला दो तुम हेली 
क्यूँ करती हो तुम अटखेली  
क्या तुम मेरी सखी सहेली 

हंसकर होले से वो  बोली  
क्यूँ अधीर होती है पगली 
मैं तो तेरी साथिन असली 
साथ सदा मै सबके रहती
चाहे हो कोई  यतिsव्रती 
मैं हूँ तेरी सखी स्मृति-
हाँ  --
होती जब तू तन्हा तन्हा 
पग धरती में नन्हा नन्हा 
तब होती न तुम अकेली 
सच,मैं तेरी सगी सहेली 
प्रमिला आर्य 
बैठ गए हैं नैया में हम पार नदी के जाना हैं 
दिल में ले के आस कि हमको तटबंधों को पाना है 

उठ उठ लहरें मचल रही हैं नैया डगमग डोल रही है 
हो ना विचलित तू मेरे माझी तुझे किनारा पाना है 
पार नदी के जाना है .................................

झंझाओं ने झकझोरा है तूफानों ने आ घेरा है 
धीरज खोना ना मेरे माझी तुझे किनारा पाना है 
पार नदी के जाना है ................................

धाराएँ प्रतिकूल हुई है तेरी दिशाएँ बदल रही है 
धाराओं का रुख तू बदल दे तुझे किनारा पाना है 
पार नदी के जाना है ................................
प्रमिला आर्य