Saturday, 2 March 2013

तांका ............ आया बसंत मीठी कूके कोयल फूटी कोंपल औढ़ चूनर धानी लगे धरा सुहानी प्रमिला आर्य ***************** हाइकू ............ बसंत आया सबके मन भाया बहार लाया ***************** मन को मोहे रंग बिरंगे फूल धरती सोहे *तांका ..हाइकू ...***************** प्रमिला आर्य

तांका ............
आया बसंत
मीठी कूके कोयल
फूटी कोंपल

औढ़ चूनर धानी
लगे धरा सुहानी
प्रमिला आर्य 
***************** हाइकू ............
बसंत आया
सबके मन भाया
बहार लाया
*****************
मन को मोहे
रंग बिरंगे फूल
धरती सोहे
******************

प्रमिला आर्य 




......
आया बसंत
मीठी कूके कोयल
फूटी कोंपल

औढ़ चूनर धानी
लगे धरा सुहानी
प्रमिला आर्य 
***************** हाइकू ............
बसंत आया
सबके मन भाया
बहार लाया
*****************
मन को मोहे
रंग बिरंगे फूल
धरती सोहे
******************

प्रमिला आर्य 




मैं हूँ पवन ---------
सन सन सन सन पवन बहे ।
गुन गुन गुन गुन यों बोले ।।

पञ्च तत्व में मैं ही समाहित
पञ्च वायु बिन जीव अपाहिज
जग सारा मुझ से गतिशील
तेरा मन भी मुझ सा डोले ।।
सन सन सन सन पवन बहे
गुन गुन गुन गुन यों बोले ।।

सर्व व्यापी पर हूँ निराकार
प्राण मैं ही जीवन आधार
श्रमित जनों का श्रम मैं हर कर
हुलसाती हूँ होले होले ।।
सन सन सन सन पवन बहे
गुन गुन गुन गुन यों बोले ।।

रौद्र रूप धर करती गर्जन
देता है तब ताल प्रभंजन
जगतीतल करता है नर्तन
चिंनगारी बनती है शोले ।
सन सन सन सन पवन बहे
गुन गुन गुन गुन यों बोले

प्रमिला आर्य

सुना था कभी भोलू जी ने ...........
मोनं मूर्खस्य भूषणं
और बना लिया इसे
अपने जीवन का आदर्श वाक्य
फिर क्या था ठान ली थी मन में
चुप रह कर न ख़ुद सहन करेंगे 
ना ही होने देंगे दूसरों के साथ
अन्याय अनीति
और करने लगे भोलू  जी
हर अन्याय अनीति का विरोध
और घिर गए स्वयं विरोधियों के घेरे में 
अचरज तो तब हुआ ,
जिनके लिए विरोध मोल लिए ,
वे भी विरोधियों की कतार में नज़र आये
जहां जाते जिनसे बात करते
वे ही करते वाक् बाणों  के अगणित तीव्र प्रहार
बेचारे भोलू जी का हो गया जीना दुश्वार
और तब लगे सोचने ---------
काश में चुप रहता
क्योंकि यह भी तो कहा है --
एक चुप सौ सुख
और सबसे भली चुप
प्रमिला आर्य


जिंदगी कहे

तांका .............
जिंदगी कहे
जी ले हंस कर तू
हो ना उदास
संघर्ष आते जाते
सदा साथ ना रहे
प्रमिला आर्य

सजन बिन कटे ना दिन रैन मन बेचैन

सजन  बिन 
कटे ना दिन रैन 
मन बेचैन

सवेरा हुआ

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सवेरा हुआ
बाल अरुण रवि
उदित हुआ
==============
लालिमा छाई
सुन्दर नीलाम्बर
धरा मुस्काई
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तिमिर भागा
सारा संसार जागा
प्रभात आया
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प्रमिला आर्य






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याद बहुत तुमआती हो माँ------------

याद बहुत तुमआती हो माँ------------
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बिछड़ी हो जब से तुम मुझसे
झर झर झरते नयनों सेअश्रु
कौन इन्हें अब समझाए माँ
याद बहुत तुमआती हो माँ

व्याकुल जब जब मनवा होता 
शीश हाथ धर नेह जताती
बाहुपाश में अपने लेकर
मुझको धीर बंधाती थी माँ
याद बहुत तुमआती हो माँ

कष्ट अनेकों चुप चुप सहती
मुख से कुछ ना कहती माँ
उपकार अनेकों मुझ पर तेरे
उऋण कभी ना होऊँ माँ
याद बहुत तुमआती हो माँ

सूरत हर पल आँख में रहती
पर ना तुम अब दिखती हो माँ
प्यार दया ममता की मूरत
निर्मोही क्यों हो गई माँ
याद बहुत तुमआती हो माँ

प्रमिला आर्य




खा कर पछाड़ गिरती भू पर माता का हृदय तड़पता

खा कर पछाड़ गिरती भू पर
माता का हृदय तड़पता है
हाथों में रक्षा सूत्र लिए
बहना का प्यार बिलखता है
बांध तोड़ अश्रु झरते हैं
सजनी सिन्दूर सिसकता है
मासूमों की किलकारी का
बचपन अनजान सुबकता है
देखा कर हैवानियत हैवानों की
पत्थर का दिल भी रोता है
प्रमिला आर्य

दर्द देता है

दर्द देता है
दस्तक दिल के द्वार
तन्हाई तब

करती झंकृत
मन वीणा के तार
बहने लगती
शब्द सुरों की
एक मधुर रसधार
अंकुरित होकर भाव
लहलहाने लगते
हृदय मरुधरा पर
और फिर फलित होते
गीत ग़ज़ल कविता के फल
मधुर और सुमधुर ............
प्रमिला आर्य