Tuesday, 7 August 2012

तिल तिल जलता 
जग जंजालों में 
ज्वाला ज्वलित 
व्यथा व्यथित 
अभिशप्त मन तब 
चाहता निश्शेष पलों में 
मलय स़ी शीतलता 
और असीम शांति /
पर --
अभिलाष यह 
तीव्र जितनी 
लौ लपटें 
घनीभूत उतनी 
घेर लेती ज़िन्दगी को 
तोड़ देती हौंसले को 
मोड़ देती ज़िन्दगी की राह को /
पर होते हैं जो धीर वीर 
तान कर सीना खड़े हो 
करते डट कर सामना 
ललकारते 
विकराल रिपु को
रौंद देते नियति के 
घिनौने मंसूबों को 
और प्रतिकूल को 
अनुकूल कर 
मोड़ लेते ज़िन्दगी की राह को /
प्रमिला आर्य 

यादें .................


प्रार्थना प्रभु से................

 प्रार्थना प्रभु से
भक्ति का भाव भरदो हृदय में तेरे चरणों में वंदन  करूँ  मैं 
सारे जग का हो मंगल प्रभु जी तेरी पूजा ओअर्चन करूँ मैं 

महरबानी प्रभू  ऐसी  करना सुख दुःख में सदा सम रहूँ मैं 
दुखोंसे मन ना विचलित कभी हो मदमाऊं ना सुख में कभी मैं 
भक्ति का भाव भरदो हृदय में ....................................

कर्म करती रहूँ मैं सदा ही फल की इच्छा कभी ना हो मन में 
जग के जंजाल में ना मैं उलझूं जल में जैसे कमलवत रहूँ मैं 
भक्ति का भाव भर दो हृदय मैं ......................................

जल थल में तलातल चराचर में तेरी लीला का विस्तार स्वामी 
सर्वव्यापी  है  सत्ता  तिहारी दर्शन  कण- कण में तेरा  करूँ मैं 
भक्ति का भाव भरदो हृदय में ....................................
प्रमिला आर्य 

बसंत ...........

बसंत आया बीता पतझड़, पीला हुआ धरांचल l
आओ मिलकर खुशियों से हम, भर लें अपना आँचल ll

घनीभूत हो आसमान में, मदमाये गहराए l
गरज बरस कर बिखर गए अब, छंट गए काले बादल ll

पतझड़ से वीरान विटप पर, फूटी कोमल कोंपल l
कुहुक कुहुक कर गाने गाये, बैठ डाल पर कोयल ll

फूलों ने उपवन महकाया, करते भंवरे गुंजन l
भोर सुहानी शाम रूहानी, वसुधा का अरुणांचल ll

सनसन करती पवन सुहानी, हरती मन का व्याकुल l
कानों में रस ऐसे घोले, छनकी हो ज्यों पायल ll

बसंत अब ना जा पायेगा, मन विश्वास जगा ले l
पतझड़ का बस अंत हो गया, घायल खग क्यूँ पागल ll
- प्रमिला आर्य
उजाड़ रहा निर्मोही पतझर जब बगिया के सिंगार को ,
अवलोक रहा था लघु सा तिनका  वीराने संसार को ,
धीर बंधा कर तिनका बोला क्यों होती व्याकुल पगली .
दिन तेरे फिर से बदलेंगे आने  दे बसंत  बहार को ,
प्रमिला आर्य

पा कर स्वर का साथ तार वीणा के  बजने लगे
लय और आलाप के संग गीत सुन्दर सजने लगे
आरोही अवरोही बन कर राग मधुर बहने लगे 
भाव सरित की लहरों में अवगाहन करने लगे 
प्रमिला आर्य 
अपना भी तुझे लगे सताने 
ज़िन्दगी खुद लगे रुलाने 
साया अपना लगे डराने 
जग भी चाहे लगे मिटाने
बन नरेन्द्र हुंकार भर तू 
भव की मत परवाह कर तू 
जग के होंश उड़ाता चल तू 
ज़िन्दगी खुद बदल जाएगी
             हार का भी जीत का भी ज़िन्दगी तो एक मेला 
            राग का औ द्वेषता का मनुज ने है खेल खेला 

            ज़िन्दगी तो इक समर है डाल ना हथियार डर के 
             वीर बन के सामना कर सिह स़ी हुँकार भर के 
             जीत ले बन दीप तू घनघोर अंधियारा जो फैला 
              हार का भी जीत का भी ...........................

               चिकनी चुपड़ी बात करते पीठ पे वो ही वार करते 
                मीत ना होते कभी वे व्यर्थ में जो दम्भ भरते 
               मस्त हो वे घूमते ऑ सज्जनों ने कष्ट झेला   
              राग का और द्वेषता का .................         
             
               ठान ली गर मन में अपने कष्ट से क्यूँ आह भरना 
              औंखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या है डरना 
               हौंसलों  के  पर लगा कर भर उड़ाने तू अकेला 
               हार का कभी जीत का .........................

              अपनी आँखें बंद करके कर ना तू विश्वास जग में 
              फूल से जो रम्य दिखते शूल वो ही बोते मग में 
                आस्तिन के सांप बन कर दंश देते हैं विषेला 
                 राग का और द्वेषता का .....................

                  रोएगा तो जग हंसेगा तू हंसेगा जग जलेगा 
                 जगत की है रीत न्यारी अपना बन तुझको छलेगा 
                मीत अपना तू स्वयं बन सुखद हो या दुखद बेला 
                राग का और द्वेषता का ................................
        
             काल की ही ताल पे ये थिरकता संसार सारा 
             काल के ही वार से फिर सिहरता संहार हारा
             नाश कर देगा ये ऐसे जैसे माटी का हो ढेला 
             हार का भी जीत का भी .........................
                                                       प्रमिला आर्य 


























बाबुल .............

बाबुल तेरी लाडली , याद करे दिन रात 
दर्शन देते क्यों नहीं, रूठे हो क्या तात

बगिया  फूली  देख  के,  हर्षित  होते  आप 
खुशियों में अब साथ नहिं, मन में ये सन्ताप

बरस बीत गए पांच पर ,लगती कल की बात 
नाते तोड़ के चल दिए , लगता है  आघात 

लुटता रहा आशियाना..............

गीत
लुटता रहा आशियाना हम तो देखते रहे l
लाचारगी बेबसी के अश्रु पोंछते  रहे ll
 
अरमान दफ़ना सीनें में अभावों में खुद जिये l
उज़ड़ गया चमन हमारा सपने टूटते रहे ll

ये वक्त का तकाज़ा था बुलाये जब वो गए l
रिश्ते नाते भूल गए कन्नी काटते रहे ll

फ़र्ज़ निभाने में हम तो हमको भूल ही गए l
ज़िन्दगी की ख्वाहिशों को ताक़ में धरते रहे ll

दुखियों के पोंछ आँसू हम उनकी पीर  को हरेंl
इन्सां वही   इंसानियत की राह जो चलता रहे ll
                                     प्रमिला  आर्य 

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Monday, 6 August 2012

तार वीणा के

पा कर स्वर का साथ तार वीणा के  बजने लगे 
लय और आलाप के संग गीत सुन्दर सजने लगे 
आरोही अवरोही बन कर राग मधुर बहने लगे  
भाव सरित की लहरों में अवगाहन करने लगे 
प्रमिला आर्य